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एक माह की बच्ची को गंभीर ब्रेन हेमरेज से मिली राहत, पारस हेल्थ उदयपुर में बिना सर्जरी हुआ इलाज

31 अगस्त 2026, उदयपुर: 1 महीने की बच्ची जो अचानक से अपने बाएं पैर और बांह को हिलाने में असमर्थ हो गई थी और उसकी दाईं आंख भी ठीक से नहीं खुल ...


31 अगस्त 2026, उदयपुर: 1 महीने की बच्ची जो अचानक से अपने बाएं पैर और बांह को हिलाने में असमर्थ हो गई थी और उसकी दाईं आंख भी ठीक से नहीं खुल पा रही थी, अब वह पारस हेल्थ उदयपुर में ब्रेन सर्जरी करने के बाद गंभीर ब्रेन हेमरेज से उबर चुकी है। आलिया नाम की इस नवजात बच्ची में गंभीर सबड्यूरल हेमेटोमा, मिडलाइन शिफ्ट, हर्नियेशन के लक्षण और दौरे की समस्या थी। इसके साथ ही बहुत कम वज़न और गंभीर एनीमिया के कारण ब्रेन का ओपन ऑपरेशन करना बेहद खतरे से भरा था।

 बच्ची के माता-पिता को अचानक न्यूरोलॉजिकल बदलाव दिखने के बाद वे उसे पहले गुजरात के एक हॉस्पिटल में ले गए। वहां जांच में पता चला कि उसके दिमाग में खून का थक्का है। फिर सर्जरी कराने की सलाह दी गई। इसके बाद परिवार ने पारस हेल्थ उदयपुर के न्यूरोसर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अमितेंदु शेखर से संपर्क किया और आगे के इलाज के लिए अहमदाबाद से उदयपुर आए।

 बच्चे की इमेजिंग और टेस्ट की विधिवत चिकित्सीय जांच और रिव्यू के बाद न्यूरोसर्जिकल टीम ने कई ऐसे फैक्टर्स की पहचान की जिनकी वजह से तुरंत सर्जरी करना खतरों से भरा था। छोटी बच्ची की बहुत कम उम्र, बहुत कम वज़न और बहुत कम हीमोग्लोबिन को देखते हुए टीम ओपन ब्रेन सर्जरी के दौरान खून की कमी के ख़तरे को लेकर खास तौर पर परेशान थी, क्योंकि इतने छोटे बच्चे में तेज़ी से खून बदलना खास तौर पर मुश्किल होता है।

पारस हेल्थ उदयपुर के न्यूरोसर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अमितेंदु शेखर ने इस मामले की गंभीरता के बारे में बताते हुए कहा, “जब हमने पहली बार बच्चे की जांच की, तो हमारी दो मुख्य चिंताएं थीं। एक उसमें गंभीर न्यूरोलॉजिकल कमियां थी और दूसरा बहुत कम वज़न व कम हीमोग्लोबिन था। इतने छोटे बच्चे में ओपन ब्रेन सर्जरी के दौरान खून का बहना ही जानलेवा हो सकता है, और तेज़ी से खून की कमी पूरी करना भी बहुत मुश्किल काम होता है। इसलिए हमने सावधानीपूर्वक निगरानी के साथ कंज़र्वेटिव ट्रीटमेंट (बिना सर्जरी के इलाज) का विकल्प चुना, साथ ही यह भी तय किया कि अगर हालत बिगड़ी तो सर्जरी की जाएगी। बिना ओपन ब्रेन ऑपरेशन के ही उसकी न्यूरोलॉजिकल कमियां धीरे-धीरे ठीक हो गईं। यह परिणाम इस मामले को खास बनाता है और बहुत छोटे बच्चों में दिमाग की ठीक होने की अद्भुत क्षमता को दिखाती है। यह बच्चों की न्यूरोसर्जरी में अलग अलग मरीज में सही इलाज चुनने की अहमियत बताता है, क्योंकि समय पर सही इलाज से बड़ा बदलाव आ सकता है।”

 जब बच्ची का मेडिकल इलाज़ शुरू किया गया तो उसे कड़ी निगरानी में रखा गया। मेडिकल टीम ने उसके दिमाग में सूजन और खून के थक्के पर नज़र रखने के लिए रेगुलर MRI और बेडसाइड ब्रेन अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल किया। इससे उन्हें गंभीर रूप से बीमार बच्ची को बेवजह हिलाने से बचने में मदद मिली। इलाज से दिमाग की सूजन धीरे-धीरे कम हुई, और उसकी न्यूरोलॉजिकल हालत में सुधार हुआ। उसके हाथ-पैर की हरकतें और आँखों का काम बेहतर हो गया, और फॉलो-अप स्कैन से पता चला कि खून का थक्का साफ हो गया था। टीम ने ज़रूरत पड़ने पर बच्चे की खोपड़ी पर अभी भी खुले नरम हिस्से से खून निकालने जैसे मिनिमली इनवेसिव प्रोसीजर पर भी विचार किया था। हालाँकि क्योंकि बच्ची ने मेडिकल इलाज़ पर अच्छी प्रतिक्रिया दी, इसलिए इन प्रक्रियाओं को करने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

पारस हेल्थ उदयपुर के न्यूनेटॉलॉजी के कंसल्टेंट डॉ राजकुमार बिश्नोई ने कहा, “गंभीर रूप से बीमार ऐसे नवजात शिशु में, जिसे बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग हुई हो, इलाज के लिए नियोनेटोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, इमेजिंग और सपोर्टिव केयर टीमों के बीच बेहतर तालमेल बेहद जरूरी होता है। इतनी कम उम्र और वजन वाले बच्चे में खून की मात्रा, हीमोग्लोबिन या न्यूरोलॉजिकल स्थिति में मामूली बदलाव भी गंभीर परिणाम दे सकता है। इसलिए हमारा मुख्य ध्यान बच्चे की शारीरिक स्थिति को स्थिर बनाए रखने, उसकी लगातार निगरानी करने और रिकवरी में मदद करने पर था। साथ ही हमने ऐसे किसी भी हस्तक्षेप से बचने की कोशिश की, जिससे बच्चे के लिए अतिरिक्त ख़तरा पैदा हो सकता था। इस उपचार पद्धति से बच्चे की स्थिति में अच्छा सुधार हुआ और पूरे इलाज के दौरान उसकी सेहत में सुधार पर लगातार नजर रखी गई।”

 लगातार निगरानी और मेडिकल मैनेजमेंट से बच्चे की न्यूरोलॉजिकल कमियां धीरे-धीरे ठीक हो गईं। अब बताया जा रहा है कि वह सक्रिय है, खेल रही है, उसका वज़न बढ़ रहा है और उसे कोई दर्द नहीं हो रहा है। फॉलो-अप असेसमेंट से पता चला है कि दिमाग में अब कोई ब्लड क्लॉट नहीं बचा है। यह केस नियोनेटल और पीडियाट्रिक न्यूरोसर्जरी में अलग अलग मरीज़ के हिसाब से फैसला लेने की अहमियत को दिखाता है, खासकर जब बहुत छोटे और मेडिकली कमजोर मरीज़ों का इलाज किया जा रहा हो, जिनके लिए पारंपरिक सर्जरी में काफी खतरे हो सकते हैं तो ऐसे में फैसला काफ़ी सोच समझ कर लेना पड़ता है। यह बच्चों में मुश्किल न्यूरोलॉजिकल स्थिति को मैनेज करने में कोऑर्डिनेटेड मल्टीडिसिप्लिनरी देखभाल और गहन निगरानी की भूमिका को भी दिखाता है।

पारस हेल्थ उदयपुर गंभीर न्यूरोलॉजिकल और न्यूनेटल बीमारियों वाले मरीज़ों को विशेषज्ञ और मिलकर देखभाल देने के लिए समर्पित है। इस मामले का सफल नतीजा यह दिखाता है कि हॉस्पिटल एक्सपर्ट डॉक्टरों, सही सुविधाओं और मल्टीडिसिप्लिनरी देखभाल को मिलाकर खासकर गंभीर रूप से बीमार और कमज़ोर मरीज़ों के लिए समय पर और पर्सनलाइज़्ड इलाज के फैसले लेने पर फोकस करता है।

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