उदयपुर। भारतीय संस्कृति में पर्व केवल पूजा-अर्चना के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे समाज को संवेदना, सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी ...
उदयपुर। भारतीय संस्कृति में पर्व केवल पूजा-अर्चना के अवसर नहीं हैं, बल्कि वे समाज को संवेदना, सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देते हैं। शरद पूर्णिमा ऐसा ही एक पर्व है, जो चंद्रमा की उज्ज्वल चाँदनी, भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला और समृद्धि की कामना से जुड़ा है। उपनिदेशक राजकीय पशुपालन प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर के डॉ.द्वारका प्रसाद गुप्ता ने बताया कि इस पर्व को पशुपालन और पशु कल्याण के दृष्टिकोण से देखें तो इसका संदेश और भी व्यापक हो जाता हैl
डॉ. गुप्ता ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण का गोपालक स्वरूप भारतीय ग्रामीण संस्कृति में विशेष स्थान रखता है। गायों और बछड़ों के साथ उनके संबंध हमें यह प्रेरणा देते हैं कि पशु केवल आजीविका के साधन नहीं, बल्कि संवेदनशील जीव हैं जिनकी देखभाल करना हमारा कर्तव्य है। राजस्थान के ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों में गाय, भैंस, बकरी और भेड़ पालन परिवारों की आजीविका तथा आर्थिक सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से सीमित संसाधनों वाले परिवारों के लिए पशुधन आय, पोषण और रोजगार का सहारा बन सकता है। इसलिए पशुओं का स्वस्थ रहना ग्रामीण समृद्धि से सीधे जुड़ा है।
शरद पूर्णिमा पर दूध से खीर बनाने की परंपरा हमें दुग्ध उत्पादन के महत्त्व की याद दिलाती है। लेकिन गुणवत्तापूर्ण दूध प्राप्त करने के लिए पशु का स्वस्थ होना, संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, साफ दुहाई और दूध का उचित भंडारण आवश्यक है। पशु के बीमार होने पर समय पर पशु चिकित्सक से संपर्क करना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
शरद पूर्णिमा हमें यह अवसर देती है कि हम धार्मिक आस्था को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ें। गाँवों में पशु स्वास्थ्य जागरूकता शिविर, स्वच्छ दूध उत्पादन संबंधी जानकारी और पशु कल्याण के संदेश के माध्यम से इस पर्व को जनहित का अवसर बनाया जा सकता है। आइए, इस शरद पूर्णिमा पर हम संकल्प लें कि पशुओं के प्रति दया, वैज्ञानिक पशुपालन, स्वच्छ दुग्ध उत्पादन और समय पर पशु चिकित्सा सेवा को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे। क्योंकि स्वस्थ पशुधन से ही सशक्त पशुपालक, समृद्ध परिवार और खुशहाल ग्रामीण समाज का निर्माण होता है।
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