प्रो. वैद्य महेश दीक्षित, कुलपति श्रीकल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय कल्याण-लोक, जावदा, निम्बाहेड़ा (चित्तोडगढ़) राज. एक समय था जब मानव समाज की सब...
प्रो. वैद्य महेश दीक्षित, कुलपति
श्रीकल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय
कल्याण-लोक, जावदा, निम्बाहेड़ा (चित्तोडगढ़) राज.
एक समय था जब मानव समाज की सबसे बड़ी चिंता अकाल मृत्यु थी। संक्रामक रोग, कुपोषण और सीमित चिकित्सा सुविधाएँ लोगों को अपेक्षाकृत कम आयु में ही जीवन से विदा कर देती थीं। लेकिन 21वीं सदी में परिदृश्य बदल चुका है। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति, बेहतर पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं ने मनुष्य की औसत आयु में उल्लेखनीय वृद्धि की है। आज दुनिया पहले से कहीं अधिक समय तक जीवित रह रही है। किंतु इसी उपलब्धि ने एक नई चुनौती को जन्म दिया है—बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य, सक्रियता और जीवन की गुणवत्ता को कैसे बनाए रखा जाए?
यही कारण है कि इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम "योग फॉर हेल्दी एजिंग" रखी गई है। यह विषय केवल योगाभ्यास तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य से जुड़ा हुआ एक वैश्विक विमर्श है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आगामी दो-तीन दशकों में दुनिया की वृद्ध आबादी अभूतपूर्व रूप से बढ़ने वाली है। वर्ष 2050 तक 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या दो अरब से अधिक होने का अनुमान है। भारत भी इस परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। आज जो देश युवा आबादी के लिए जाना जाता है, वह आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों वाला राष्ट्र बनने जा रहा है।
स्वाभाविक रूप से इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। वृद्धावस्था के साथ मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर, गठिया, ऑस्टियोपोरोसिस, अल्जाइमर और अवसाद जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ता है और परिवारों पर देखभाल का दबाव भी बढ़ता है। लेकिन समस्या केवल शारीरिक रोगों की नहीं है। आधुनिक जीवनशैली ने वृद्धावस्था में एक और संकट खड़ा कर दिया है—अकेलापन।
संयुक्त परिवारों का स्थान एकल परिवारों ने ले लिया है। घरों में सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संवाद घटा है। तकनीक ने दूरियों को कम किया है, परंतु मनुष्यों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ती दिखाई देती है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि सामाजिक अलगाव और अकेलापन वृद्धावस्था में स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। इसलिए आज स्वस्थ वृद्धावस्था का अर्थ केवल रोगमुक्त रहना नहीं, बल्कि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से सक्रिय बने रहना है।
यहीं भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा विश्व को नई दिशा देती दिखाई देती है। आयुर्वेद और योग हजारों वर्षों से इसी समग्र स्वास्थ्य की बात करते आए हैं। आयुर्वेद का मूल उद्देश्य ही है— "स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम् आतुरस्य विकार प्रशमनम्।" अर्थात् स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगों का निवारण करना।
आयुर्वेद वृद्धावस्था को जीवन का स्वाभाविक चरण मानता है। यह मानता है कि उम्र बढ़ना प्रकृति का नियम है, लेकिन समय से पहले जर्जर हो जाना जीवनशैली की त्रुटियों का परिणाम हो सकता है। अनियमित भोजन, तनाव, रात्रि जागरण, निष्क्रिय जीवन, मानसिक अशांति और प्रकृति से दूरी शरीर को वास्तविक आयु से पहले ही बूढ़ा बना देते हैं।
आज आधुनिक विज्ञान भी इसी निष्कर्ष की ओर बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में योग पर हुए अनेक शोध बताते हैं कि नियमित योगाभ्यास वृद्धजनों में संतुलन, लचीलापन और मांसपेशीय शक्ति को बढ़ाता है। इससे गिरने और चोट लगने की संभावना कम होती है। योग तनाव हार्मोनों को नियंत्रित करता है, नींद की गुणवत्ता सुधारता है और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। ध्यान और प्राणायाम स्मृति, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुए हैं।
विशेष रूप से "सुपर एजर्स" पर किए गए अध्ययनों ने शोधकर्ताओं को चौंकाया है। ऐसे लोग जो 80-90 वर्ष की आयु में भी मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यंत सक्रिय बने रहते हैं, उनमें कुछ समान गुण पाए गए—नियमित शारीरिक गतिविधि, सकारात्मक सोच, सामाजिक सहभागिता, उद्देश्यपूर्ण जीवन और मानसिक शांति। यदि ध्यान से देखा जाए तो ये सभी तत्व योग और आयुर्वेदिक जीवनशैली के मूल सिद्धांत हैं।
योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी विशेष आयु वर्ग तक सीमित नहीं है। यदि युवा अवस्था में योग को जीवन का हिस्सा बना लिया जाए तो वृद्धावस्था की अनेक समस्याओं को प्रारंभ में ही रोका जा सकता है। और यदि वृद्धावस्था में भी योग अपनाया जाए तो जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
हालाँकि स्वस्थ वृद्धावस्था केवल आसनों का परिणाम नहीं है। इसके लिए संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, सकारात्मक संबंध, मानसिक संतुलन और जीवन में उद्देश्य का होना भी उतना ही आवश्यक है। योग और आयुर्वेद मिलकर व्यक्ति को यही समग्र दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
आज जब पूरी दुनिया "हेल्दी एजिंग" की चर्चा कर रही है, तब भारत के पास ऐसा ज्ञान है जो केवल रोगों का उपचार नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने की कला सिखाता है। यह समय योग को केवल एक दिवस के आयोजन के रूप में देखने का नहीं, बल्कि उसे जीवनशैली का हिस्सा बनाने का है। अंततः स्वस्थ वृद्धावस्था का अर्थ केवल अधिक समय तक जीवित रहना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक चरण को गरिमा, ऊर्जा और आनंद के साथ जीना है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की इस वर्ष की थीम हमें यही संदेश देती है कि भविष्य का स्वास्थ्य अस्पतालों में नहीं, बल्कि हमारी दिनचर्या, जीवनशैली और योगमय जीवन दृष्टि में निहित है।

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