धर्म प्रभावना और रोजी-रोटी: जैन चातुर्मास का व्यावहारिक व आर्थिक पक्ष डॉ वरुण मुनि (डी. लिट्ट.), पाली राजस्थान जैन धर्म में 'चातुर्मास...
धर्म प्रभावना और रोजी-रोटी: जैन चातुर्मास का व्यावहारिक व आर्थिक पक्ष
डॉ वरुण मुनि (डी. लिट्ट.), पाली राजस्थान
जैन धर्म में 'चातुर्मास' केवल एक ऋतु परिवर्तन या कालखंड नहीं है, बल्कि यह आत्मा के शुद्धीकरण, आत्म-निरीक्षण और गहन आध्यात्मिक साधना का महापर्व है। यह पावन काल न केवल व्यक्तिगत चेतना को जगाता है, बल्कि राष्ट्र की नैतिक, सामाजिक और आर्थिक सुदृढ़ता का भी एक सशक्त आधार बनता है। संतों के सानिध्य में चार महीने तक चलने वाला यह आयोजन मानव जीवन को सात्विकता और परमार्थ की ओर मोड़ने का एक महान उपक्रम है।
चातुर्मास का प्रारंभ और कालावधि
तिथि और समय की दृष्टि से जैन चातुर्मास की समय-सीमा अत्यंत वैज्ञानिक और प्रकृति के चक्र से जुड़ी हुई है:
प्रारंभ (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा): चातुर्मास का औपचारिक और पूर्ण प्रारंभ आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से इस वर्ष हुआ है, जिसे भारतीय संस्कृति में 'गुरु पूर्णिमा' भी कहा जाता है। इस दिन साधु-संत अपने निश्चित चातुर्मास स्थल पर पूरी तरह स्थिरवास (विहार रोककर एक ही स्थान पर रुकने) का दृढ़ संकल्प ले लेते हैं।
समापन (कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा): चार महीनों की यह सघन साधना कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पूर्ण होती है। इस दिन साधु-संतों का यह 'स्थिर वास' समाप्त होता है और वे पुनः लोक-कल्याण के लिए 8 महीनों के लिए पदविहार प्रारंभ करते हैं।
ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
जैन परंपरा में चातुर्मास की शुरुआत भगवान महावीर और उनसे पूर्व के तीर्थंकरों के समय से ही रही है। इसके पीछे धार्मिक के साथ-साथ अत्यंत वैज्ञानिक कारण भी हैं:
अहिंसा का परम पालन: वर्षा ऋतु में प्रकृति में नए जीव-जंतुओं, सूक्ष्म वनस्पतियों और कीड़े-मकौड़ों की उत्पत्ति बड़े पैमाने पर होती है। विहार पर रोक: जैन साधु वर्षभर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पदविहार (पैदल यात्रा) करते हैं। परंतु, चातुर्मास के दौरान एक ही स्थान पर ठहरने का नियम है ताकि चलने-फिरने से अनजाने में भी किसी सूक्ष्म जीव की हिंसा न हो। यह 'अहिंसा परमो धर्मः' के सिद्धांत का व्यावहारिक रूप है।
चतुर्विध संघ का एकत्रीकरण और विराट स्वरूप
चातुर्मास की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि इस अवधि में भारत की पावन धरा पर अध्यात्म का एक अभूतपूर्व ज्वार उमड़ता है। देश भर के अनेक प्रांतों, महानगरों, शहरों और सुदूर गांवों में जैन परंपरा की विभिन्न धाराओं
श्वेतांबर स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथ एवं दिगंबर समुदाय—के अनेक साधु-साध्वी भगवंत एक स्थान पर स्थिर वास करते हैं।
संपूर्ण भारतवर्ष में लगभग 19 से 20 हजार साधु-संतों के इन चातुर्मासों में ज्ञान, वैराग्य और तपस्या का त्रिवेणी संगम देखने को मिलता है। इन संत-सतियों के चरणों में बैठकर करोड़ों श्रावक अपने जीवन को धन्य बनाते हैं। संतों की पावन निश्रा में कोटि-कोटि जन मानस जिस त्याग, उपवास, संयम और सदाचार का व्रत लेता है, वह अंततः संपूर्ण राष्ट्र की आध्यात्मिक ऊर्जा को सिंचित और पल्लवित करता है।
साधु और श्रावक के कर्तव्य
चातुर्मास के दौरान जैन समाज के दोनों अंगों—श्रमण वर्ग और गृहस्थ वर्ग—के लिए विशेष आचार-संहिता का विधान है।
जैन साधु-साध्वी की चर्या: चार महीनों तक साधु-साध्वी एक ही स्थान (उपाश्रय, स्थानक या जिनालय) पर रुककर साधना करते हैं। वे प्रतिदिन श्रावकों को धर्मोपदेश देते हैं, शास्त्रों का वाचन करते हैं, और अपने तप तथा ध्यान को और अधिक सघन बनाते हैं।
श्रावक-श्राविका (गृहस्थ) का दायित्व: गृहस्थ इस दौरान अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हैं। संतों के आहार-पानी (गोचरी) और वैयावृत्य (सेवा) की व्यवस्था करना, रात्रि भोजन का त्याग करना, सात्विक जीवन शैली अपनाना और प्रतिदिन सामूहिक प्रतिक्रमण, सामायिक व भाव अर्चना करना उनकी मुख्य चर्या होती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में संबल का स्रोत: एक व्यावहारिक दृष्टिकोण
अक्सर बाहरी दृष्टि से देखने वाले कुछ लोगों को चातुर्मास के दौरान होने वाले वृहद आयोजन, धार्मिक पांडाल और विशाल व्यवस्थाएं 'फिजूलखर्ची' या धन का अपव्यय नजर आ सकती हैं। परंतु, यदि सूक्ष्मता और व्यावहारिक धरातल पर देखा जाए, तो जैन चातुर्मास भारतीय आर्थिक व्यवस्था में संबल और मजबूती का एक बहुत बड़ा स्रोत है। इसके पीछे सामाजिक समरसता के साथ-साथ लाखों परिवारों की रोजी-रोटी भी जुड़ी रहती है:
1. अप्रत्यक्ष रोजगार का सृजन: चातुर्मास के दौरान होने वाले आयोजनों, प्रवचन पंडालों की साज-सज्जा, टेंट, माइक-साउंड, आवास व्यवस्था, छपाई-प्रकाशन और सात्विक भोजन प्रबंधन में अरबों रुपए का व्यय होता है। यह व्यय सीधे तौर पर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े श्रमिकों, कारीगरों, छोटे व्यापारियों और सेवा प्रदाताओं की जेब में जाता है। इस प्रकार, यह आयोजन समाज में धन के समतामूलक वितरण और रोजगार का एक बड़ा जरिया बनता है।
2. धर्म प्रभावना का सहायक अंग: जैन दर्शन में धन के संचय (परिग्रह) को दोष माना गया है, किंतु जब समाज के धनिक और श्रीमंत (संपन्न) वर्ग द्वारा अपने न्यायोपार्जित धन का उपयोग धर्म के प्रचार-प्रसार, संतों की सेवा और धार्मिक आयोजनों में किया जाता है, तो यह 'धर्म प्रभावना' का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सहायक अंग बन जाता है। लक्ष्मी का उपयोग जब धर्म और लोक-कल्याण के कार्यों में होता है, तो वह समाज को समृद्ध करती है।
3. नैतिकता से सुदृढ़ व्यापारिक तंत्र: चातुर्मास में संत समाज को जो व्यावहारिक और धार्मिक जीवन की शिक्षा देते हैं, उसमें 'अचौर्य' (चोरी न करना), 'अहिंसा' (किसी को कष्ट न देना) और 'सत्य' के सिद्धांतों पर विशेष बल दिया जाता है। जब समाज और व्यापार जगत का व्यक्ति चोरी, कालाबारी और मिलावटखोरी जैसी प्रवृत्तियों से दूर रहने का संकल्प लेता है, तो देश में एक स्वच्छ, पारदर्शी और नैतिक अर्थव्यवस्था का निर्माण होता है।
चातुर्मास के मुख्य पर्व और अनुष्ठान
चातुर्मास की अवधि कई महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों से समृद्ध होती है:
पर्युषण महापर्व / दशलक्षण पर्व: भाद्रपद मास में श्वेतांबर परंपरा में यह 8 दिन और दिगंबर परंपरा में 10 दिन तक चलता है। यह आत्म-शुद्धि, उपवास और कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को शांत करने का समय है।
क्षमापना (संवत्सरी): पर्युषण के अंतिम दिन 'मिच्छामि दुक्कड़ं या खमत खामणा' कहकर वर्षभर में जाने-अनजाने किए गए अपराधों के लिए ब्रह्मांड के सभी जीवों से क्षमा मांगी जाती है और सबको क्षमा किया जाता है।
महावीर स्वामी निर्वाण कल्याणक (दीपावली): चातुर्मास के उत्तरार्ध में भगवान महावीर के मोक्ष गमन के प्रतीक स्वरूप आध्यात्मिक दीप जलाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाया जाता है।
जैन चातुर्मास केवल एक संप्रदाय विशेष के कर्मों की निर्जरा का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव मात्र को 'स्वार्थ से परमार्थ' की ओर ले जाने वाला एक राष्ट्रव्यापी अनुष्ठान है। यह चार महीने मनुष्य को सिखाते हैं कि कम से कम साधनों में कैसे आनंदपूर्वक जिया जा सकता है। जहाँ एक ओर 19-20 हजार संतों की आध्यात्मिक ऊर्जा और श्रावकों का त्याग देश के नैतिक ताने-बाने को मजबूत करता है, वहीं दूसरी ओर चातुर्मास के दौरान होने वाली व्यावहारिक गतिविधियां देश की आर्थिक व्यवस्था को गतिशीलता प्रदान करती हैं। आधुनिक युग में, चातुर्मास एक आदर्श 'आध्यात्मिक, सामाजिक और आर्थिक संतुलन' का सर्वोत्तम उदाहरण है, जो लोक-कल्याण और राष्ट्र-कल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है।

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