Page Nav

HIDE

Classic Header

{fbt_classic_header}

breaking news

latest

अनंत सूत्र, पितृपक्ष और नल-दमयंती के प्रसंगों के साथ ‘अपनों से अपनी बात’ पूर्ण

उदयपुर, 23 सितंबर।  नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में आस्था चैनल पर चल रहा आध्यात्मिक क...


उदयपुर, 23 सितंबर।
 नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में आस्था चैनल पर चल रहा आध्यात्मिक कार्यक्रम ‘अपनों से अपनी बात’ बुधवार को अनंत चतुर्दशी, पितृपक्ष और नल-दमयंती के प्रेरक प्रसंगों के साथ संपन्न हुआ।

अग्रवाल ने अनंत सूत्र की कथा में सुमंत ब्राह्मण की पुत्री सुशीला और ऋषि कौंडिन्य का प्रसंग सुनाया गया। सुशीला ने अनंत भगवान का व्रत रखकर चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र धारण किया, जिसके बाद उनके घर में समृद्धि आने लगी। कौंडिन्य ने इसे अपनी मेहनत का परिणाम मानकर सूत्र को तोड़कर अग्नि में डाल दिया। इसके बाद उनका वैभव समाप्त होने लगा। अपनी भूल का एहसास होने पर वे अनंत भगवान की खोज में निकले। मार्ग में उन्हें आम का पेड़, गाय, बैल और दो तालाब मिले। भगवान ने इनके पूर्वजन्म के कर्मों का रहस्य बताया और कौंडिन्य को चौदह वर्ष तक अनंत व्रत करने का निर्देश दिया।
पितृपक्ष के प्रसंग में एक निर्धन ब्राह्मणी की कथा के माध्यम से बताया गया कि श्राद्ध में बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और भावना होती है। ब्राह्मणी के पास पितरों का श्राद्ध करने के लिए कोई साधन नहीं था। उसने दोनों हाथ उठाकर सच्चे मन से अपने पितरों से प्रार्थना की। उसके निर्मल भाव को स्वीकार करते हुए पितरों ने स्वयं को तृप्त बताया। इस प्रसंग ने यह संदेश दिया कि सच्ची श्रद्धा और भाव ही पितरों के प्रति सबसे बड़ा अर्पण है।
इसके बाद राजा नल और दमयंती का प्रसंग आया। नल द्वारा अनंत सूत्र तोड़े जाने के बाद कलि के प्रभाव से उन्हें जुए में अपना राज्य गंवाना पड़ा। वनवास के दौरान परिस्थितियां इतनी विकट हुईं कि नल ने दमयंती को अकेला छोड़ दिया। दमयंती ने अनंत भगवान का व्रत आरंभ किया। दूसरी ओर नल कर्कोटक नाग के प्रभाव से बाहुक रूप में अयोध्या पहुंच गए। बाद में दमयंती की युक्ति से नल की पहचान हुई और दोनों का पुनर्मिलन हुआ। नल ने पुनः पुष्कर को पराजित कर अपना राज्य प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति की कथाएं केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन के लिए भी आचरण और संवेदना का मार्गदर्शन करती हैं।

No comments