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अच्छा दिखना और अच्छा होना दोनों में बहुत अन्तरः आचार्य मणिप्रभ सूरीश्वर महाराज

उदयपुर । परम पूज्य खतरच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वर मसा आदि ठाणा ने दादाबाड़ी स्थित वासुपूज्य मन्दिर में प्रातःकालीन धर्मसभा मे कह...


उदयपुर । परम पूज्य खतरच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वर मसा आदि ठाणा ने दादाबाड़ी स्थित वासुपूज्य मन्दिर में प्रातःकालीन धर्मसभा मे कहा कि सुबह जब आंख खुलती हैं तब सपने सारे  टूट जाते  हैं। थकावट सारी मिट गई। तरोताजगी आ जाती है लेकिन सबसे पहले हम जो विचार करते हैं उसी में हमारा व्यक्तित्व नजर आता है।

उन्होंने कहा कि अच्छा दिखूं यह बाहर का विषय है। लोगों के द्वारा दिया गया प्रमाण पत्र सच्चा भी होता है झूठा भी हो सकता है, लेकिन स्वयं से स्वयं का आंकलन जरूरी है। अच्छा दिखना और अच्छा होना दोनों में फर्क है। मैं भविष्य के लिए सोचता हूं या भगवान के लिए यह महत्वपूर्ण है। जीवन छोटा है तभी इसका मूल्य है। अगर जीवन अनन्त काल का होता तो इसका कोई मोल नहीं होता जीवन छोटा है और कब तक चलेगा यह हमें पता नहीं है, तभी हम जी पा रहे हैं हैं। अगर पता होता तो न हम जी पाते और ना ही जीवन में कुछ कर पाते ।
आचार्यश्री ने कहा कि हम अपने जीवन में चलने के लिए रास्तों का चुनाव सही नहीं कर पाते हैं , तभी हमारे में भटकाव आता है। जो हमारे पास है वह हमें दिखाई नहीं देता है और जो नहीं है वह हमें बार-बार दिखाई देता है। यही हमारे दुःख का कारण है। गाड़ी हमारा शरीर है जो काफी मूल्यवान है, लेकिन शरीर हमारा धोखेबाज हैं। ज़िन्दगी का चौराहा बहुत महत्वपूर्ण होता है  यही आपको विकल्प देता है कि आपको जाना कहां है और आपकी मंजिल कहां है। हमारे शरीर रूपी गाड़ी ही हमें मोक्ष मार्ग तक ले जाती है। बाकी दुनिया की कोई भी मंहगी से महंगी गाड़ी भी आपको मोक्ष मार्ग तक नहीं पहुंचा सकती है। हमारे शरीर रूपी गाड़ी का ड्राईवर का कैसा होना चाहिए, जो आपका हित सोचे वो अच्छा या जो आपके सुख के बारे में सोचे वो अच्छा। यह चिन्तन का विषय है, लेकिन चिन्तन करेंगे तो यही निकल कर आएगा कि जो हमारे हित की सोचे वही ड्राईवर अच्छा होता है। हर एक के शरीर का ड्राईवर मन ही होता है। हमें अपने मन पर नजर रखना है नियंत्रण रखना है क्योंकि करने वाला तो मन होता है लेकिन भुगतना आत्मा को पड़ता है। मन को बहकने में समय नहीं लगता रोशनी का रोशनी का कोई मूल्य नहीं होता। रोशनी का मूल्य अंधेरे में होता है। आज्ञाकारी और हितकारी होने में भी फर्क है। पंचमकाल में अज्ञानत रूपी अन्धकार से बचाने वाला परमात्मा ही है। जो शरीर का हित करता है वही आत्मा का हित कर सकता है। इसलिए अपने मन को हितकारी बनाना है सुखकारी नहीं। जो शरीर रूपी गाड़ी हमें मिली है यह बन्द हो उससे पहले ही उसका पूरा उपयोग कर लो। हर समय को हर पल को अन्तिम मान कर ही दान पुण्य करो। आज से ही शुरू करो और अभी से करो।

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