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राष्ट्रसंत पुलक सागर के सानिध्य में विशेष 10 दिवसीय शिविर में मनाया सातवें दिन उत्तम तप धर्म दिवस

- तप पकने की प्रयोगशाला है, जो तपता नहीं वो पकता नहीं - राष्ट्रसंत पुलक सागर - शिविरार्थियों ने नृत्य करते हुए की संगीतमय पूजा एवं धर्म आराध...


- तप पकने की प्रयोगशाला है, जो तपता नहीं वो पकता नहीं - राष्ट्रसंत पुलक सागर

- शिविरार्थियों ने नृत्य करते हुए की संगीतमय पूजा एवं धर्म आराधना
उदयपुर 3 सितम्बर । राष्ट्रसंत आचार्य पुलक सागर ससंघ का चातुर्मास सर्वऋतु विलास मंदिर में बड़ी धूमधाम से आयोजित हो रहा है । इसी श्रृंखला में बुधवार को सातवें दिन उत्तम तप धर्म दिवस मनाया गया । राष्ट्रसंत आचार्य पुलक सागर के सानिध्य में टाउन हॉल में पाप नाशनम शिविर के अंतर्गत 700 शिविरार्थियों ने एक जैसे वस्त्र पहन कर शिविर में भाग लिया, और संगीतमय पूजा एवं धर्म आराधना की । चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विनोद फांदोत ने बताया कि पहली बार आचार्य पुलक सागर महाराज के सानिध्य में दिगम्बर समाज के सभी पंथों का पर्युषण पर्व मनाया जा रहा है, कार्यक्रम की श्रृंखला में प्रात: 5.30 बजे प्राणायाम, प्रात: 7.30 बजे अभिषेक हुआ, उसके बाद शांतिधारा एवं पूजन सम्पन्न हुई ।
प्रात: 9.30 बजे आचार्यश्री का विशेष प्रवचन उत्तम तप धर्म दिवस पर हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने कहा कि तप से ही मुक्ति के द्वार खुलते हैं। तप पकने की प्रयोगशाला है, जो तपता नहीं वो पकता नहीं। आत्मा की शुद्धि तपश्चरण से होती है। तपने के बाद ही आत्मा परमात्मा बनती है। फसल तपती है, तभी पकती है दूध पकता है तपने के बाद। धरती, सूरज, दीपक, सभी तपते हैं। तीर्थंकरों का भी उपदेश है कि तपो। शरीर तपेली है और आत्मा दूध। तप के बिना कर्मो का नाश नहीं होता। तपे बिना आत्मशुद्धि भी नहीं होती। आत्मा को स्वर्ण बनाना है तो इसे तपाना पड़ेगा। तप से ही पारमार्थिक लक्ष्य प्राप्त हो सकता है। खुद में खुद को पाना ही तप है। मुक्ति के लिए तप अन्तिम और एकमात्रा जतन है। देहासक्त नहीं, देहातीत जीवन जियो, देहासक्त तो जानवर होते हैं। आसक्ति वहीं ला पटकेगी जहाँ अभी हो। मुनिवरों की पिच्छिका भी तप का ही परिचायक है। दिखने में हल्की लगती है लेकिन उठाने में पसीने आ जाते हैं। यह संयम और अहिंसा का उपकरण तो है ही त्याग और तप का भी शाश्वत प्रमाण है।
चातुर्मास समिति के महामंत्री प्रकाश सिंघवी एवं प्रचार संयोजक विप्लव कुमार जैन ने बताया कि प्रवचन के बाद 10.30 बजे सिंधी धर्मशाला में सभी साधकों का भोजन, दोपहर 12.30 बजे सामायिक मंत्र जाप, दोपहर 2 बजे धार्मिक प्रशिक्षण, शंका समाधान, तत्व चर्चा हुई । सायं 7.30 बजे गुरु भक्ति एवं श्रीजी की महाआरती हुई । उसके बाद प्रतिदिन रात्रि 8 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुतियां हुई । इस अवसर पर विनोद फान्दोत, शांतिलाल भोजन, आदिश खोडनिया, पारस सिंघवी, अशोक शाह, शांतिलाल मानोत, नीलकमल अजमेरा, सेठ शांतिलाल नागदा सहित सम्पूर्ण उदयपुर संभाग से हजारों श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे।

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