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समता, न्याय और राष्ट्रवाद के प्रतीक: बाबा साहेब अम्बेडकर

भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रखर चिंतक एवं सामाजिक न्याय के महान योद्धा डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के विचार आज भी राष्ट्र निर्माण की दिश...


भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रखर चिंतक एवं सामाजिक न्याय के महान योद्धा डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के विचार आज भी राष्ट्र निर्माण की दिशा में मार्गदर्शक हैं। उन्होंने न केवल सामाजिक समरसता और समानता का संदेश दिया, बल्कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सर्वोपरि रखा।

पाकिस्तान निर्माण के संदर्भ में बाबा साहेब ने स्पष्ट रूप से कहा था कि इतिहास की अनदेखी करना घातक हो सकता है। फरवरी 1942 में बम्बई में अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “Thoughts on Pakistan” पर बोलते हुए उन्होंने चेताया कि इतिहास को भूलने वाले कभी इतिहास निर्माण नहीं कर सकते। उन्होंने राष्ट्रभक्ति, सैन्य सुदृढ़ता और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा कि देश की रक्षा का दायित्व स्वयं नागरिकों का है।

कश्मीर मुद्दे पर भी बाबा साहेब का दृष्टिकोण स्पष्ट और यथार्थवादी था। उन्होंने राष्ट्रीय निष्ठा को सर्वोपरि मानते हुए कहा कि देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की निष्ठा भारत के प्रति होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने सामाजिक समरसता की आवश्यकता पर बल दिया और यह भी संकेत किया कि आंतरिक विभाजन राष्ट्र के लिए घातक हो सकता है।

हिन्दू कोड बिल के माध्यम से बाबा साहेब ने सामाजिक समानता और न्याय की दिशा में ऐतिहासिक पहल की। यह विधेयक विभिन्न भारतीय समुदायों के लिए समान नागरिक अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, जिसका उद्देश्य समाज में समावेशी दृष्टिकोण स्थापित करना था।

1930 का कालाराम मंदिर सत्याग्रह बाबा साहेब के सामाजिक संघर्ष का महत्वपूर्ण अध्याय रहा। नासिक स्थित इस मंदिर में अछूतों के प्रवेश पर रोक के विरुद्ध उन्होंने हजारों अनुयायियों के साथ आंदोलन चलाया। यह संघर्ष न केवल धार्मिक अधिकारों के लिए था, बल्कि सामाजिक समानता और मानव गरिमा की स्थापना का प्रतीक भी बना। बाबा साहेब का मानना था कि समाज में व्याप्त जाति, वर्ग और वर्ण भेद ही राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी हैं। उन्होंने आह्वान किया कि इन विभाजनों को समाप्त कर ही भारत अपने खोए हुए वैभव को पुनः प्राप्त कर सकता है। भारतीय संस्कृति की मूल भावना समरसता, सहअस्तित्व और तर्कशीलता पर आधारित रही है, जिसे अपनाकर ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। आज आवश्यकता है कि हम उनके विचारों से प्रेरणा लेते हुए सामाजिक विषमताओं को समाप्त करें और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाएं। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

— प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार बहरवाल

प्राचार्य, सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय, अजमेर।

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