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राष्ट्रसंत पुलक सागर के सानिध्य में विशेष 10 दिवसीय शिविर में मनाया आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म दिवस

- जीवन में अर्जन के साथ विसर्जन भी आवश्यक - राष्ट्रसंत पुलक सागर - शिविरार्थियों ने नृत्य करते हुए की संगीतमय पूजा एवं धर्म आराधना उदयपुर 4 ...


- जीवन में अर्जन के साथ विसर्जन भी आवश्यक - राष्ट्रसंत पुलक सागर

- शिविरार्थियों ने नृत्य करते हुए की संगीतमय पूजा एवं धर्म आराधना
उदयपुर 4 सितम्बर । राष्ट्रसंत आचार्य पुलक सागर ससंघ का चातुर्मास सर्वऋतु विलास मंदिर में बड़ी धूमधाम से आयोजित हो रहा है । इसी श्रृंखला में गुरुवार को आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म दिवस मनाया गया । राष्ट्रसंत आचार्य पुलक सागर के सानिध्य में टाउन हॉल में पाप नाशनम शिविर के अंतर्गत 700 शिविरार्थियों ने एक जैसे वस्त्र पहन कर शिविर में भाग लिया, और संगीतमय पूजा एवं धर्म आराधना की । चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विनोद फांदोत ने बताया कि पहली बार आचार्य पुलक सागर महाराज के सानिध्य में दिगम्बर समाज के सभी पंथों का पर्युषण पर्व मनाया जा रहा है, कार्यक्रम की श्रृंखला में प्रात: 5.30 बजे प्राणायाम, प्रात: 7.30 बजे अभिषेक हुआ, उसके बाद शांतिधारा एवं पूजन सम्पन्न हुई । प्रात: 9.30 बजे आचार्यश्री का विशेष प्रवचन उत्तम तप धर्म दिवस पर हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में अर्जन के साथ विसर्जन भी आवश्यक है। जीवन में यदि जोड़ते ही रहे और कुछ छोड़ा नहीं तो डूब जाओगे। सिकन्दर से भी ज्यादा जोड़ो लेकिन जब छोड़ने का समय आए तो महावीर की तरह ऐसा छोड़ो कि तन पर एक धागा भी न रहे। समय आने पर छोड़ने का भी साहस रखो। जोड़ने के साथ छोड़ने की कला भी आनी चाहिए। त्याग और दान की महिमा निराली है। इस किनारे से उस किनारे पहुँचने के लिए तट का मोह त्यागने का मनोविज्ञान उसी की समझ में आता है जिसने त्याग को जीवन में अपनाया है। एक तट का मोह त्यागे बिना दूसरे तट तक पहुँचना सम्भव नहीं है। महापुरुषों के कथनानुसार 'त्यक्तेन भुंजीताः' का सिद्धांत त्याग और दान की महिमा को बखानता है। भोग के समय भी त्याग का भाग रखो। आसक्त भाग से नहीं अनासक्त भाव से भोग करने पर ही उपभोग सार्थक होता है। आलू, प्याज, गाजर, मूली जमीन के अन्दर अपने फल छिपाए रखते हैं, इसलिए उन्हें जड़ से उखाड़ा जाता है, इसके विपरीत आम, अमरूद, अनार आदि ऐसे पेड़ हैं जो अपने पर लगने वाले फल लगातार दूसरों को देते रहते हैं। इसलिए उन्हें कभी उखाड़ा नहीं जाता। एक बार फल दे दिए, अगली बार उन्हीं पर दुगुनी संख्या में आ जाते हैं। यही तो दान की महिमा है। गाय भी अपना दूध औरों को पिलाने के लिए बेचेन रहती है। संचय वृत्ति और परिग्रह पाप है। जोड़ कर रख लो चाहे लाख हरि-मोती, मगर याद रखना कफन में जेब नहीं होती। चातुर्मास समिति के महामंत्री प्रकाश सिंघवी एवं प्रचार संयोजक विप्लव कुमार जैन ने बताया कि प्रवचन के बाद 10.30 बजे सिंधी धर्मशाला में सभी साधकों का भोजन, दोपहर 12.30 बजे सामायिक मंत्र जाप, दोपहर 2 बजे धार्मिक प्रशिक्षण, शंका समाधान, तत्व चर्चा हुई । सायं 7.30 बजे गुरु भक्ति एवं श्रीजी की महाआरती हुई । उसके बाद प्रतिदिन रात्रि 8 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम में जैन अंताक्षरी प्रतियोगिता संपन्न हुई, जिसका संयोजन राजेंद्र चित्तौड़ा एवं अमित जैन ने किया । इस अवसर पर विनोद फान्दोत, शांतिलाल भोजन, आदिश खोडनिया, पारस सिंघवी, अशोक शाह, शांतिलाल मानोत, नीलकमल अजमेरा, सेठ शांतिलाल नागदा सहित सम्पूर्ण उदयपुर संभाग से हजारों श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे।

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