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आओ-आओ कागला आओ‘ पर कागले है नदारद, अब बचाने की जरुरत

उदयपुर। श्राद्ध पक्ष के दिनो में प्रायः सुबह के समय सभी छतो पर आओ-आओ कागला आओ की आवाज आसानी से सुनी जा सकती है, किन्तु अब ये कागले अर्थात कौ...


उदयपुर। श्राद्ध पक्ष के दिनो में प्रायः सुबह के समय सभी छतो पर आओ-आओ कागला आओ की आवाज आसानी से सुनी जा सकती है, किन्तु अब ये कागले अर्थात कौवे बिल्कुल नदारद हो चुके हैं। लोग अपने श्राद्ध का अनुष्ठान गाय या अन्य पक्षियों को खिलाकर पूरा करते हैं। 

यह जानकारी उपनिदेशक डॉ. सुरेन्द्र छंगाणी ने दी। डॉ. छंगाणी के अनुसार इस विलुप्त होती प्रजाति का मुख्य कारण प्रदूषण ही है। कौवे सड़ी-गली एवं गंदगी को खाया करते हैं किन्तु आजकल कुड़ा करकट पोलिथीन में ही भरकर फैंका जाता है। शोध के अनुसार वर्तमान में मृत पशु के शरीर के मांस में कईं प्रकार के रासायनिक पाये जाते है जिसके खाने से पक्षियों की किड़नी खराब हाने की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त खेतों में अत्यधिक मात्रा में रासायनिक ऊर्वरकों एवं कीटनाशक का उपयोग भी इनके विनाशका प्रमुख कारण है। डॉ. छंगाणी के अनुसार हम सबके सम्मिलित प्रयासों से इस विलुप्त होती प्रजाति को बचा सकते है एवं पुनः घर की मुण्डेर पर आकर कौवे बैठकर अपने कावं-कावं से आगन्तुकों के आने की या चिट्ठी आने की सूचना दे सकते हैं। झूठ बोले कौवा काटे कहावत भी अपना अस्तित्व बनाये रख सकती है।


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