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मृत्यु से भय नहीं, आत्मकल्याण की ओर यात्रा है मृत्युः‘मृत्यु भाव यात्रा’ में धर्म का मर्म समझाया

उदयपुर। श्री जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक जिनालय समिति की ओर से नव्यप्रसन्नकीर्ति म.सा.,महाशतावधानी दिव्यप्रसन्नकीर्ति म.सा.,साध्वी जिनरसाश्री...


उदयपुर। श्री जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक जिनालय समिति की ओर से नव्यप्रसन्नकीर्ति म.सा.,महाशतावधानी दिव्यप्रसन्नकीर्ति म.सा.,साध्वी जिनरसाश्री,साध्वी देवर्धिरत्नाश्री म.सा. के सानिध्य में शांतिनाथ जिनालय में आज अंत से अर्हम मृत्यु की भावयात्रा पर प्रवचन  हुए। इस अवसर पर सूरत से आये संगीतकार उत्त्मचंद ढोड़ा,एवं परेश भाई द्वारा बहुत ही भावपूर्ण व ओजस्वी वाणी में महापुरूषों के व्यक्तित्व पर अनेक उदाहरणों के माध्यम से सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं को बताया कि हम अपनी मृत्यु को भी महोत्सव बना सकते है।

‘भावयात्रा के माध्यम से जैन दर्शन के उस गूढ सत्य को समझाया गया कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की अनवरत यात्रा का एक पड़ाव है। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को मृत्यु के प्रति भय त्यागकर समभाव, आत्मचिंतन और धर्म साधना अपनाने का संदेश दिया गया।
आयोजन के दौरान ‘मृत्यु यानी महोत्सव’ की भावना को सरलता से समझाते हुए बताया गया कि मनुष्य यदि जीवनभर धर्म, संयम, सदाचार और अच्छे कर्मों के मार्ग पर चलता है तो मृत्यु के समय भी मन को शांत एवं समभाव में रखने का प्रयास कर सकता है। मृत्यु निश्चित है, इसलिए उससे घबराने के बजाय उसके आध्यात्मिक स्वरूप को समझना आवश्यक है।
धर्म संदेश में कहा गया कि संसार में मनुष्य धन, परिवार, वैभव और मोह-माया के अनेक बंधनों में बंधा रहता है, लेकिन मृत्यु के समय इन सभी सांसारिक संबंधों और वस्तुओं को यहीं छोड़ना पड़ता है। साथ केवल आत्मा और उसके कर्म जाते हैं। इसलिए जीवन रहते ही मोह-माया को कम कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
जैन दर्शन के अनुसार शरीर नश्वर है, आत्मा शाश्वत है। जिस प्रकार व्यक्ति पुराने वस्त्रों का त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा भी एक शरीर का त्याग कर कर्मानुसार आगे की यात्रा करती है। इस सत्य को समझने वाला व्यक्ति मृत्यु को केवल दुखद घटना के रूप में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरण के अवसर के रूप में देखता है।
कार्यक्रम में बीमारी, बुढ़ापा और शारीरिक पीड़ा को शरीर की स्वाभाविक अवस्थाएं बताते हुए कहा गया कि ऐसी परिस्थितियों में भी प्रभु-स्मरण, आत्मचिंतन और समभाव बनाए रखना चाहिए। जीवनभर की धर्म साधना का उद्देश्य यही है कि अंतिम समय में मन भय, पछतावे और मोह से मुक्त होकर शांति एवं संतोष में रहे।
समिति अध्यक्ष सुशील बांठिया ने बताया कि इस प्रसंग के लाभार्थी सुशील बांठिया, अनिल भण्डारी,अजय मेहता, आशा पोरवाल,सुरेन्द्र तारावत, मोहनलाल मेहता,हितेन्द्र शोभावत,रमेश मारू आदि परिवार थे।

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