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समुद्र मंथन ने दिया संदेश-अहंकार से विनाश, सहयोग से सृजन : प्रशांत अग्रवाल

उदयपुर, 24 अगस्त।  सावन मास के चौथे सोमवार को नारायण सेवा संस्थान में चल रही ‘भोलेनाथ की शरण में-अपनों से अपनी बात’ शिव कथा में संस्थान अध्य...


उदयपुर, 24 अगस्त।
 सावन मास के चौथे सोमवार को नारायण सेवा संस्थान में चल रही ‘भोलेनाथ की शरण में-अपनों से अपनी बात’ शिव कथा में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने व्यास पीठ से समुद्र मंथन का प्रसंग सुनाते हुए अहंकार, संयम, सहयोग और लोक कल्याण का संदेश दिया।

उन्होंने कथा प्रसंग सुनाते हुए कहा कि दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को श्री से परिपूर्ण दिव्य माला भेंट की। इंद्र ने उसे अपने हाथी ऐरावत पर रख दिया। ऐरावत ने माला को जमीन पर गिराकर कुचल दिया। इससे क्रोधित दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को शाप दिया कि तीनों लोक श्री और ऐश्वर्य से विहीन हो जाएंगे। इसके बाद राजा बलि के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं पर आक्रमण किया और देवता पराजित हो गए।

चिंतित देवता पहले ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और फिर भगवान विष्णु की शरण में गए। विष्णु ने उन्हें असुरों से युद्ध के बजाय संधि कर समुद्र मंथन के माध्यम से अमृत प्राप्त करने का मार्ग बताया। देवताओं ने अमृत का प्रस्ताव देकर असुरों से संधि की। समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत को मथानी, वासुकी नाग को नेती और भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को आधार बनाया गया।

अग्रवाल ने बताया कि समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। इनमें सबसे पहले हलाहल विष निकला। इसके बाद कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, रंभा, मां लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धन्वंतरि और अमृत कलश प्रकट हुए। रत्नों का बंटवारा देवताओं और असुरों के बीच किया गया, लेकिन अमृत कलश असुरों के हिस्से में आने पर उनमें आपस में विवाद शुरू हो गया।

उन्होंने कहा कि सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और देवताओं तथा असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाकर अमृत देवताओं को पिला दिया। इसी दौरान स्वरभानु देवता का रूप धारण कर अमृत पीने में सफल हो गया। भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। यही स्वरभानु आगे चलकर राहु और केतु के रूप में प्रसिद्ध हुए।

कथा के दौरान प्रशांत अग्रवाल ने हलाहल विष के प्रसंग और भगवान शिव के नीलकंठ बनने की कथा भी सुनाई। उन्होंने कहा कि जब विष के प्रभाव से सृष्टि संकट में पड़ गई, तब भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए हलाहल विष अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण वे नीलकंठ कहलाए। उन्होंने शिवलिंग पर जल चढ़ाने का कारण भी बताया।

इस अवसर पर संस्थान की निदेशक वंदना अग्रवाल की अगुवाई में नारायण चिल्ड्रन एकेडमी के बच्चों ने कांवड़ यात्रा निकाली और भगवान शिव का जलाभिषेक किया। संस्थान संस्थापक एवं चेयरमैन कैलाश मानव भी उपस्थित रहे उन्होंने ने लाभान्वित दिव्यांगों को आशीर्वाद दिया। कथा में सैकड़ों श्रद्धालुओं और दिव्यांगजनों ने शिव कथा का रसपान किया।

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