डॉ. प्रदीप कुमावत लेखक-विचारक, विश्व हास्य गुरु वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर सम्प्रति: निदेशक, आलोक संस्थान आपने राजीनामा सुना होगा, सफरनामा भी सुन...
डॉ. प्रदीप कुमावत
लेखक-विचारक, विश्व हास्य गुरु
वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर
सम्प्रति: निदेशक, आलोक संस्थान
आपने राजीनामा सुना होगा, सफरनामा भी सुना होगा, लेकिन रजाईनामा शायद ही सुना हो। वैसे यह कोई मामूली विषय नहीं है। पता नहीं हरिशंकर परसाई ने इस पर व्यंग्य क्यों नहीं लिखा लेकिन मैं तो एक स्मित हास्य जो आपके जीवन से सहज रूप से जुड़ा है कोशिश कर रहा हूं आपको लगेगा अरे हां यह बात तो बिल्कुल सही है। हां मेरे साथ भी ऐसा हुआ। तो आइए विश्व हिन्दी दिवस की शुभकामनाओं के साथ शुरू करते हैं आज का सफर...
इन दिनों उत्तर भारत में अगर किसी चीज की सबसे ज्यादा चलती हुई चर्चा है, तो वह न किसी फिल्म की है और न किसी नेता के बयान की वह है ‘रजाई’। ठंड के मौसम में रजाई केवल एक वस्त्र नहीं रहती, वह आदमी के स्वभाव, संस्कार, दिनचर्या और आलस्य तक का पूरा नक्शा बता देती है।
हर आदमी की अपनी रजाई होती है। किसी की मोटी, किसी की पतली। किसी की जयपुरी, किसी की पुरानी भारी-भरकम देसी। किसी के पास रजाई नहीं तो कंबल है, और जिनके पास कंबल भी नहीं, उनके पास गाँव का गोदड़ा है, जो गर्म भी करता है और यादों से भी ढक देता है।
रजाई की बात चली तो एक पुराना किस्सा याद आता है। वडाली ब्रदर्स अपनी भांजी की शादी में गए थे। भांजे ने बड़े सम्मान से कहा-मामा, आप यहीं सो जाइए। मामा लेटे ही थे कि भांजे के दो दोस्त आ गए। भांजा बोला-मामा,
जरा आगे खिसक जाइए, इनके पलंग साथ लगाने हैं। मामा खिसक गए फिर एक और दोस्त आया, फिर एक और। चार बार बिस्तर बदलने के बाद मामा ने भांजे को बुलाया और पूछा-यह बता कि मुझे यहां सुलाने लाया है या सबकी रजाई गर्म करने। बात हंसी की लगती है, लेकिन सच यही है कि रजाई हमारे जीवन में जितनी निजी है, उतनी ही संवेदनशील भी।
बचपन की रजाइयाँ आज की तरह हल्की नहीं होती थीं। हमारे घरों में हरे रंग की मोटी रजाइयाँ हुआ करती थीं, जिनके किनारों पर लाल मगजी लगी रहती थी। वे इतनी भारी होती थीं कि माथे पर पड़ते ही लगता था कि अब ठंड बाहर ही रहेगी। आजकल की जयपुरी रजाइयाँ इतनी हल्की हैं कि ओढ़ लेने पर भी अहसास नहीं होता। पुराने लोग आज भी कहते हैं कि जब तक शरीर पर पाँच-छह किलो का वजन न पड़े, सर्दी का मजा नहीं आता।
उस समय रजाइयों में रूई ठूँस-ठूँस कर भरी जाती थी और बड़ी सुई से टांके लगाए जाते थे। दो-तीन साल बाद जब रजाई पिचक जाती, तो उसे पिंजारे के पास ले जाकर फिर से खुलवाया जाता और नई तरह से भराई होती। आज की
पीढ़ी से कहिए कि रजाई भरवाई जाती थी तो उन्हें लगेगा कि यह कोई प्राचीन काल की बात हो रही है। आज तो सब कुछ रेडीमेड है गद्दे भी, रजाइयाँ भी और तकिए भी।
मेवाड़ अंचल में गतलियाँ और गोदड़े प्रचलित थे। एक और शब्द काथडा इसे मैं समझा नहीं पाऊंगा। बस आप जान लें ये शब्द हुआ करता था, आज भी होता है गोदड़े के साथ जोड़ दिया जाता है। गतलियाँ पतली होती थीं, बच्चों के लिए बनाई जाती थीं और आसानी से संभाली जा सकती थीं। गोदड़े उनसे भारी होते थे और उन्हें उठाना भी एक मेहनत का काम था। सर्दी आने से पहले इन सबको धूप दिखाई जाती थी और फिर लोहे के बड़े-बड़े ट्रंकों में सहेज कर रखा जाता था।
सोने के कमरे में दीवार वाला कोना सबसे सुरक्षित माना जाता था। दीवार हवा से बचाती थी, तकिया को सहारा देती थी और रजाई के भीतर की गर्मी को बाहर जाने से रोकती थी। खिड़कियों के नाम पर बखारे होते थे-छोटी-सी लकड़ी की खिड़की, जो हवा और रोशनी के लिए होती थी। बचपन में 3-4-5 भाई बहन एक ही रजाई में सो जाया करते थे। रात को झगड़े भी होते थे तो तकिया उसमें से बहुत बड़ा हथियार होता था और रजाई की खींचतान तो मामूली हुआ करती थी। रात 11 बजे तक रजाई की खींचतान चलती और मम्मी या दादी डांटकर कहती ‘अबे होई जाओ, कई हाका कर रिया हो’’। जो लोग मेवाड़ी हैं इन सब बातों से भलीभांति परिचित हैं तो रजाई और गद्दा के बीच का अंतर ही पता नहीं था कि वो गद्दा समझकर सोया करते थे और कभी कभी गद्दा ओड़ लिया करते थे और अमूमन बारात ठहरती थी वहां तो ऐसा ही होता था कि शुरुआत में गद्दों पर सोया जाता था। रात में दरी नीचे रह जाती थी और गद्दे ऊपर ओड़ने के लिए काम में आ जाते थे तो रजाईनामा के रजाई के सफर के अलग-अलग किस्से आपके भी अपने होंगे लेकिन मैंने आप सबके अंदर के किस्से को बाहर लाने की कोशिश की है। थोड़ा
मुस्कराइए, थोड़ा हंसिए भी और अतीत की यादों को छोड़कर देखिए कि साधन कम थे लेकिन मस्ती कितनी थी।
रजाई और उन गद्दों में कितना सुकून हुआ करता था जो आज के महंगे गद्दों में शायद गायब हो गया है। 1-1 लाख के गद्दे हैं लेकिन एक पल कभी सुकून नहीं है। लेकिन उनमें रिश्तों की ऊष्मा समाप्त हो चुकी है। इसलिए सहज सरल बनिए संसाधनों में सुख नहीं है सुख अंदर है अपने अंदर है।
आइए आगे बढ़ते हैं...रजाई ओढ़ने से पहले उसे गरम करने की भी पूरी प्रक्रिया होती थी। सोने से आधा घंटा पहले पैरों को रजाई में डालकर उसे गरम किया जाता था। कुछ लोग रजाई को मुँह तक ओढ़ लेते थे, हालाँकि यह स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं माना जाता। सच यह है कि गर्मी रजाई में नहीं, शरीर में होती है। रजाई केवल उसे रोकने का काम करती है। आजकल होटलों में डबल बेड और डबल रजाई का चलन है। घरों में तो पति-पत्नी भी अपनी-अपनी रजाई ओढ़ते
हैं। पाँच सितारा होटलों की रजाइयों में सिंथेटिक रेशा भरा होता है, ऊपर से कॉटन का कवर। नतीजा यह कि चेहरा ठंडा रहता है और कमर, गर्दन तथा कंधों के आसपास पसीना आने लगता है। ऊपर से दस इंच मोटे स्प्रिंग वाले गद्दे,
जिन पर सोते-सोते कमर धनुष की तरह मुड़ जाती है। कई बार तो फर्श पर कंबल बिछाकर सोने में ज्यादा चैन मिलता है।
रजाई का संबंध रात के भोजन से भी है। अगर रात को मूली जैसी चीज खा ली, तो रजाई के भीतर का वातावरण कुछ ही देर में असहज हो जाता है। तब या तो रजाई की खिड़की खोलनी पड़ेगी या ठंड को न्योता देना पड़ेगा।
इसलिए सर्दियों में क्या खाकर सोना है, इस पर उतना ही ध्यान जरूरी है जितना रजाई पर। आजकल अलग-अलग किस्म की रजाइयाँ बाजार में हैं। जयपुरी कॉटन रजाइयाँ, मखमली रजाइयाँ, विदेशी कंबल और कंफर्टर। इनमें से सबसे अधिक गर्म मानी जाने वाली रजाई बाड़मेर के नोखा की है। यह वैक्यूम पैक होकर आती है और खोलते ही इतनी फैल जाती है कि दुबारा समेटना मुश्किल हो जाता है। सामान्य ठंड में इसे ओढ़ लिया जाए तो कुछ घंटों बाद हटानी पड़ती है।
रजाई का अपना एक निजी कैलेंडर भी होता है। कुछ लोग जुलाई से ही पतली रजाई निकाल लेते हैं। मेरी यात्रा चादर से शुरू होती है-पहले एक, फिर दो, फिर तीन। ठंड बढ़े तो शॉल जुड़ता है। कड़ाके की ठंड में पतली रजाई और जरूरत पड़ने पर भारी रजाई। रात में नींद टूटे तो रजाई बदलना भी रेलवे ट्रैक पर इंजन बदलने जैसा ही होता है। सुबह के समय रजाई का मोह सबसे अधिक होता है। वहीं से आलस्य जन्म लेता है। रजाई सुकून देती है, लेकिन अगर ज्यादा देर तक उससे चिपके रहें तो दिन हाथ से निकल जाता है। इसलिए रजाई का उपयोग उतना ही होना चाहिए जितनी जरूरत हो।
किसी ने कहा है-वीर तुम डटे रहो, रजाई में पड़े रहो।
मेरी समझ कहती है-वीर तुम खड़े रहो, रजाई से बाहर निकलो और ठंड से ही नहीं, जीवन से भी मुकाबला करते रहो।
No comments