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संविधान सिर्फ किताब नहीं, पत्रकारिता की आचार संहिता है

लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर गणतंत्र दिवस केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, यह पत्रकार के लिए आत्ममंथन और प्रतिबद्धता का दिन है। हर साल जब हम ...


लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर

गणतंत्र दिवस केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, यह पत्रकार के लिए आत्ममंथन और प्रतिबद्धता का दिन है। हर साल जब हम संविधान की महिमा को याद करते हैं, तब केवल कानून और शासन की बात नहीं होती, बल्कि यह सवाल भी सामने आता है। हम अपनी पत्रकारिता के माध्यम से लोकतंत्र को कितनी मजबूती दे रहे हैं।
संविधान सिर्फ एक किताब नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। और लोकतंत्र का प्रहरी है पत्रकारिता। सच बताना, संतुलन बनाए रखना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना-यही पत्रकारिता का मूल आधार है। 
आज का मीडिया परिदृश्य बेहद तेज़ और चुनौतीपूर्ण है। खबरें पलभर में फैलती हैं, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और टीआरपी खबर की दिशा तय करने लगे हैं। इस दौर में पत्रकारिता की राह आसान नहीं। क्लिक और वायरल कंटेंट की होड़ में कभी-कभी संतुलन खो जाता है। लेकिन यही कठिनाई इसकी खूबसूरती भी है।
संविधान हमें बोलने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन पत्रकारिता हमें सोच-समझकर बोलना सिखाती है। हर सच चिल्लाने का विषय नहीं होता, और हर मौन कायरता नहीं। पत्रकारिता का असली मूल्य तब बढ़ता है जब हम हर खबर के पीछे की जिम्मेदारी समझते हैं।
देश आज सूचना बनाम अफवाह, विचार बनाम नफरत, आलोचना बनाम असंवेदनशीलता जैसी जटिल परिस्थितियों से गुजर रहा है। ऐसे समय में पत्रकार को हर पल सजग और विवेकशील रहना पड़ता है। एक असंतुलित खबर केवल किसी की छवि नहीं बिगाड़ती, वह समाज में अविश्वास और भ्रम भी बो देती है।
पत्रकारिता केवल सवाल उठाने का काम नहीं है। सवालों को सही संदर्भ देना और समाज को सोचने का अवसर देना भी इसका कर्तव्य है। अधिकार और कर्तव्य का संतुलन संविधान में निहित है और इसी संतुलन को आत्मसात करके पत्रकारिता समाज में विश्वास और जागरूकता का पुल बनती है।
लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब कलम निर्भीक हो, लेकिन विवेकशील भी। पत्रकारिता की राह कठिन है, लेकिन यही राह देश और समाज को सुदृढ़ करने की सबसे विश्वसनीय शक्ति है। हर खबर, हर आलेख और हर टिप्पणी के पीछे न केवल सूचना बल्कि संवेदना, जिम्मेदारी और प्रभाव छुपा होना चाहिए।
गणतंत्र दिवस का असली संदेश यही है कि संविधान सिर्फ किताब नहीं, पत्रकारिता की आचार संहिता है। यह हमें याद दिलाता है कि पत्रकार का काम केवल रिपोर्ट करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत और समाज को सजग बनाए रखना भी है। आज जब लोकतंत्र के कई स्तंभ चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं, तब हमारी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
पत्रकारिता कठिन है, लेकिन इसे चुनने का मतलब है- हर दिन देश और समाज के लिए सजग रहना, सत्य और संतुलन के साथ खड़ा होना, और लोकतंत्र की रक्षा करना। यही गणतंत्र का असली सम्मान है और यही पत्रकारिता की आत्मा।

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