Page Nav

HIDE

Classic Header

{fbt_classic_header}

breaking news

latest

चुनावी रण में सितारे बनाम समाज के दुलारे

लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, पत्रकार, उदयपुर जब भी चुनाव आते हैं, तो कोई भी पार्टी हो-जाने-माने नाम, यानी सितारों को टिकट थमा देती है। यह अब परि...


लेखक: भगवान प्रसाद गौड़, पत्रकार, उदयपुर

जब भी चुनाव आते हैं, तो कोई भी पार्टी हो-जाने-माने नाम, यानी सितारों को टिकट थमा देती है। यह अब परिपाटी बन चुकी है। जिन सितारों ने कभी जनता से मुखातिब होने के लिए मंच, प्रबंधन और फीस के साथ उपस्थिति दर्ज कराई, वही चुनावी मैदान में सीधे प्रत्याशी बनकर उतर जाते हैं।
वहीं दूसरी ओर समाज के दुलारे - वे कार्यकर्ता, जो वर्षों से पार्टी के लिए जी-जान से जुटे रहते हैं, केवल इन सितारों के प्रचार में अपना जीवन खपा देते हैं। न उन्हें टिकट मिलता है, न ही कोई पद।
सितारों को टिकट देने की थ्योरी अब किसी से छिपी नहीं है। उनके पास फॉलोवर्स होते हैं, प्रचार के लिए संसाधन होते हैं और एक स्थापित पहचान होती है। इसके उलट कार्यकर्ता के पास केवल उसकी मेहनत और समाज की गहरी समझ होती है। विडंबना यह है कि इसी मेहनत और समझ को भुनाकर राजनीतिक दल अक्सर मलाई खाते हैं। कार्यकर्ता की तिलांजलि देना मानो एक सामान्य प्रक्रिया बन गई है जोकि कड़वी सच्चाई है।
असल में समाज में पैठ बनाने के लिए लोगों के बीच जीना पड़ता है, उनके दुःख-सुख को समझना पड़ता है और भरोसा अर्जित करना पड़ता है। यह काम केवल कार्यकर्ता करता है, वही से समाज का दुलारा बनता है। लेकिन टिकट वितरण की बारी आते ही यही दुलारा किनारे कर दिया जाता है और पैराशूट उम्मीदवार को उतार दिया जाता है।
हाल ही में बंगाल चुनाव का परिदृश्य इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करता है। विभिन्न दलों ने फिल्मी सितारों और चर्चित चेहरों पर दांव लगाया। सवाल यह है कि क्या किसी प्रसिद्ध गायक, खिलाड़ी या अभिनेता को प्रत्याशी बना देने मात्र से राजनीति का उद्देश्य पूरा हो जाएगा? और उन कार्यकर्ताओं का क्या, जो वर्षों से पोस्टर लगा रहे हैं, दरी-पट्टी बिछा रहे हैं और घर-घर जाकर पार्टी की बात पहुंचा रहे हैं?
हर बार जब यह सवाल उठता है, तो दल ढुलमुल और टालमटोल जवाब देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। स्थिति जस की तस बनी रहती है-परिवारवाद और पैराशूट लैंडिंग का वर्चस्व। यह प्रवृत्ति केवल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा  नहीं, बल्कि संगठन के भविष्य के लिए  खतरे की घंटी है। इस पर गंभीर मंथन आवश्यक है।
इतिहास गवाह है कि जब गलत चीज परंपरा बन जाती है, तो जनता एक दिन सख्त निर्णय भी लेती है। हमारे पड़ोसी देशों में सत्ता परिवर्तन के साथ नए और जमीनी चेहरे उभरकर सामने आए हैं, जो आम आदमी के मन को छूने वाले फैसले लेते हैं।
हर नागरिक को अपनी विचारधारा के अनुसार वोट देने और उम्मीदवार चुनने की स्वतंत्रता है। लेकिन जब पार्टियां न जनमत का सहारा लेती हैं, न पारदर्शी प्रक्रिया अपनाती हैं, और केवल जातिगत, सामाजिक व आर्थिक समीकरणों के आधार पर निर्णय थोपती हैं, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
यदि यही स्थिति बनी रही, तो यह भावी पीढ़ी और आने वाले संगठनात्मक ढांचे के लिए गंभीर चुनौती खड़ी करेगी। लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है कि सितारों के साथ-साथ समाज के दुलारों को भी समान अवसर मिले-क्योंकि असली ताकत वहीं से आती है।

No comments