विशेष आलेख विनय सोमपुरा, सहायक जनसंपर्क अधिकारी, उदयपुर वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान - 2026 उदयपुर। राजस्थान के दक्षिणांचल में अरावली क...
विशेष आलेख
विनय सोमपुरा, सहायक जनसंपर्क अधिकारी, उदयपुर
वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान - 2026उदयपुर। राजस्थान के दक्षिणांचल में अरावली की उपत्यकाओं के मध्य स्थित मेवाड़ प्राचीनकाल से ही वर्षा जल संचय और जल प्रबंधन की मिसाल रहा है। रियासत काल में राणाओं और महाराणाओं ने दूरदर्शिता के साथ यहां के जलाशयों के निर्माण और नदियों को जोड़ने के भगीरथ प्रयास किए, इसकी बदौलत सदियों बाद भी उदयपुर में पेयजल संकट के हालात नहीं बनते हैं। संभवतया जल प्रबंधन के इससे अच्छे प्राचीन उदाहरण और कहीं नहीं मिलते हैं। मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार की ओर से पिछले दो वर्षों से जल संरक्षण के प्रति जनजागृति के लिए वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान चलाया जा रहा है। मेवाड़ और खास कर उदयपुर इस अभियान का रोल माॅडल कहा जा सकता है।
मेवाड़ में जल संरक्षण और जल प्रबंधन के विश्व में सर्वाधिक प्राचीन उदाहरण मिलते हैं। यहां सदियों पहले से ही वर्षा जल को वृहद् स्तर पर सहेजने की शुरूआत हो चुकी थी। अरावली की पहाड़ियों से पश्चिम की ओर बहने वाले पानी को सहजने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूर पर तालाब बनाए गए। मदार बड़ा और मदार छोटा तालाब भरने के बाद इनका पानी थूर की पाल से चिकलवास पिकअप वियर से मदार नहर होते हुए फतहसागर झील को भरता है। मदार नहर की क्षमता से ज्यादा पानी आने पर चिकलवास पिकअप वियर से आयड़ नदी होते हुए मदार का पानी उदयसागर पहुंचता है। पानी की आवक ज्यादा होने पर स्वरूप सागर लिंक नहर से फतहसागर भरा जाता है। बड़ी तालाब के छलकने पर इसका पानी भी फतहसागर में पहुंचता है। पिछोला और फतहसागर भरने के बाद पानी गुमानिया नाल से आयड़ नदी होते हुए उदयसागर पहुंचता है। यहां से पानी बेड़च नदी होते हुए वल्लभनगर बांध को भरता है उसके बाद पानी चित्तौड़ जिले में स्थित बड़गांव बांध और घोसुंडा बांध को भरता है। इन बांधों की पूर्ति होने के बाद उदयपुर की झीलों से पानी बनास नदी होते हुए बीसलपुर बांध पहुंचता है।
19वीं सदी में ही हो गई थी नदियों को जोड़ने की पहल
नदियों को जोड़ने की पहल भी 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सर्वप्रथम मेवाड़ में हुई। तत्कालीन महाराणा फतहसिंह ने वर्ष 1890 में उदयपुर शहर से 6 किलोमीटर दूर चिकलवास गांव के समीप आहड़ नदी पर एक बांध बनवाया। वर्षा ऋतु में प्रवाहित अतिरिक्त जल को फतहसागर झील तक पहुंचाने के लिए चिकलवास नहर का निर्माण किया। इसके अलावा राणा राज सिंह ‘प्रथम’ ने तीर्थ स्थल उबेश्वर क्षेत्र से निकलने वाली उबेश्वर नदी को मोडकऱ मोरवानी नदी में मिला दिया। इस प्रकार यह जल जनासागर तथा फतह सागर में पहुंचा। उदयपुर शहर में गोवर्धन सागर, दूध तलाई, पिछोला झील, अमर कुण्ड, कुम्हारिया तालाब, रंगसागर, स्वरूप सागर तथा फतहसागर जलाशयों का निर्माण जल प्रबंधन की दृष्टि से विश्व भर में श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
बावडिय़ां भी हैं देती हैं जल संरक्षण का संदेश
मेवाड़ ने हमेशा से ही पानी को संरक्षित किया। ये प्रयास महाराणा प्रताप के समय से हुए। मेवाड़ में बेवरी से लेकर बावड़ी तक डाबर से लेकर सरोवर तक मिल जाते हैं। मेवाड़ में कई तरह की बावडिय़ां हैं जिनमें एक मुखी, दो मुखी, त्रिमुखी, चैमुखी बावड़ी मिलती हैं। ये बावडिय़ां जल संरक्षण का संदेश देती हैं।
विदेशी वैज्ञानिकों ने भी स्वीकारा जल प्रबंधन कौशल
मेवाड़ के जल प्रबंधन कौशल को विदेशी जल वैज्ञानिकों के दल ने भी स्वीकारा है। वर्ष 2021-22 में उदयपुर आए वैज्ञानिकों ने दल ने अपने अध्ययन में पाया कि मेवाड़ में सदियों पहले जिस दूरदर्शिता के साथ जल प्रबंधन के क्षेत्र में काम हुआ, वह अद्भूत है। यहां हर साल 6328 एमसीएफटी वर्षा जल सहेजा जाता है, जो अपने आप में अनूठा उदाहरण है। मदार बड़ा तालाब की भराव क्षमता 84 एमसीएफटी, मदार छोटा की 30, बड़ी तालाब की 371, देवास प्रथम की 126, आकोदड़ा की 302, मादड़ी की 85, फतहसागर की 427, पिछोला की 483, गोवर्धन सागर की 9, उदयसागर की 1100, वल्लभनगर बांध की 1076, बड़गांव की 1112 तथा घोसुंडा की 1123 एमसीएफटी है। जल संरक्षण और जल प्रबंधन के लिए जलशक्ति मंत्रालय एवं इलेट्स टेक्नोमीडिया की ओर से आयोजित नेशनल वाटर इनोवेशन समिट एंड अवाड्र्स कार्यक्रम में उदयपुर जिले को उत्कृष्ट वर्षा जल संग्रहण के लिए नेशनल वॉटर इनोवेशन अवॉर्ड से नवाजा गया था। इसके अलावा उदयपुर मे सफल व परिणाम मूलक प्रयोग के बाद जल प्रबंधन मे जन भागीदारी बढ़ाने के माय वेल मोबाइल एप को जल शक्ति मंत्रालय ने देश भर के लिए जारी किया है। उदयपुर में जल प्रबंधन को लेकर मिलने वाले प्राचीन उदाहरणों से प्रेरित होकर ही जल शक्ति मंत्रालय ने जनवरी 2024 में नेशनल लेवल की वाटर कांफ्रेन्स का आयोजन उदयपुर में किया था।
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