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पारस हेल्थ उदयपुर ने एडवांस्ड मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी से 16 साल की लड़की को दी नई ज़िंदगी

10 जुलाई 2026, उदयपुर: पारस हेल्थ उदयपुर ने एक दुर्लभ और जीवन रक्षक मेडिकल प्रक्रिया करके 16 साल की एक लड़की का सफलतापूर्वक इलाज किया। लड़की...


10 जुलाई 2026, उदयपुर: पारस हेल्थ उदयपुर ने एक दुर्लभ और जीवन रक्षक मेडिकल प्रक्रिया करके 16 साल की एक लड़की का सफलतापूर्वक इलाज किया। लड़की को 'लार्ज वेसल ऑक्लूजन' (LVO) स्ट्रोक हुआ था। इस स्ट्रोक में खून का थक्का दिमाग की मुख्य धमनियों में से एक को ब्लॉक कर देता है और दिमाग तक खून का बहाव रोक देता है। इमरजेंसी 'मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी' प्रक्रिया को पारस हेल्थ उदयपुर के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरो-इंटरवेन्शन स्पेशलिस्ट डॉ. तरुण माथुर और न्यूरोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. मनीष कुलश्रेष्ठ ने अपनी मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम के साथ मिलकर अंजाम दिया। उन्होंने सफलतापूर्वक थक्के को हटाया, दिमाग में खून का बहाव फिर से शुरू किया और लड़की के दिमाग की कार्यक्षमता को बचाते हुए उसे हमेशा के लिए न्यूरोलॉजिकल विकलांगता से बचाया।

लड़की को अचानक शरीर के एक तरफ कमज़ोरी महसूस होने, बोलने में दिक्कत होने और चेहरे के एक तरफ लटकने की वजह से पारस हेल्थ उदयपुर ले जाया गया। ये लक्षण स्ट्रोक के होते हैं। जांच और टेस्ट के बाद डॉक्टरों को पता चला कि खून के थक्के (ब्लड क्लॉट) ने दिमाग की मुख्य धमनियों में से एक को ब्लॉक कर दिया था, जिससे दिमाग के एक बड़े हिस्से में खून का बहाव रुक गया था। टेस्ट के रिजल्ट में उसे 'लार्ज वेसल ऑक्लूज़न' (LVO) होने का पता चला। यह स्ट्रोक का एक गंभीर प्रकार होता है। इससे बचने के लिए तुरंत इलाज की ज़रूरत होती है। चूंकि टीनएज में स्ट्रोक बहुत कम होता है और तुरंत इलाज ज़रूरी था, इसलिए यह मामला खास तौर पर चुनौतीपूर्ण हो गया था।

इस मामले पर टिप्पणी करते हुए पारस हेल्थ उदयपुर के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट और न्यूरो-इंटरवेन्शन स्पेशलिस्ट डॉ. तरुण माथुर ने कहा, “स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसे बूढों की बीमारी माना जाता रहा है लेकिन अब यह बच्चों और यहां तक की टीनएज युवाओं में भी हो रहा है। अचानक चेहरे का एक तरफ झुकना, कमज़ोरी, बोलने में दिक्कत, संतुलन बिगड़ना या देखने में बदलाव जैसे लक्षणों को कभी भी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। स्ट्रोक के मामले में हर मिनट कीमती होता है। सही समय पर पहचान, स्ट्रोक रेडी हॉस्पिटल तक तेज़ी से पहुँचना और ज़रूरत पड़ने पर 'मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी' (खून का थक्का हटाने की प्रक्रिया) से मरीज़ के ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है और स्थायी विकलांगता को रोका जा सकता है। इन लक्षणों की जल्द पहचान और इलाज के लिए माता-पिता, शिक्षकों और समुदाय में जागरूकता बहुत ज़रूरी है।”

पारस हेल्थ उदयपुर में न्यूरोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. मनीष कुलश्रेष्ठ ने बताया, “हालांकि बच्चों और टीनएज युवाओं में स्ट्रोक कम ही होता है, लेकिन अगर होता है तो देर से पता चलने पर इसके नतीजों पर बुरा असर पड़ सकता है। यह मामला तुरंत ब्रेन इमेजिंग, स्ट्रोक के इलाज के लिए बने खास सेंटर में जल्द रेफर करने और समय पर इलाज शुरू करने की अहमियत को बताता है। मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी जैसी नई तकनीकों की वजह से अब स्ट्रोक के कई युवा मरीज़ों के ठीक होने की बहुत अच्छी संभावना होती है, और उन्हें लंबे समय तक न्यूरोलॉजिकल विकलांगता का सामना भी कम करना पड़ता है।”

मरीज़ के ठीक होने के लिए हर मिनट ज़रूरी था, इसीलिए स्ट्रोक टीम ने तुरंत इमरजेंसी इलाज शुरू कर दिया। डॉक्टरों ने 'मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी' की। यह प्रक्रिया एक कम चीर-फाड़ वाली प्रक्रिया है। इसमें एक पतली नली (कैथेटर) को रक्त वाहिका के ज़रिए अंदर डालकर थक्के को हटाया जाता है और दिमाग तक ख़ून का प्रवाह फिर से शुरू किया जाता है। खून के बहाव को तेज़ी से बहाल करने से दिमाग को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिली और टीनएज लड़की के ठीक होने की संभावनाएँ काफ़ी बढ़ गईं।

इस सफल परिणाम पर प्रतिक्रिया देते हुए पारस हेल्थ उदयपुर के फैसिलिटी डायरेक्टर श्री अनुभव सुखवानी ने कहा, “इतने कम उम्र के मरीज़ में स्ट्रोक का इलाज करने के लिए तेज़ी से फ़ैसला लेने, खास एक्सपर्टीज और बेहतरीन टीमवर्क की ज़रूरत होती है। यह मामला हमारे मल्टीडिसिप्लिनरी स्ट्रोक प्रोग्राम की विशेषज्ञता और समय पर एडवांस्ड स्ट्रोक केयर देने के हमारे समर्पण को दिखाता है। इन्हीं खूबियों की बदौलत मरीज़ों के ठीक होने की सबसे अच्छी संभावना बनती है।”

इस प्रक्रिया के बाद उस टीनएजर लड़की की हालत में काफ़ी सुधार हुआ और वह अच्छी तरह ठीक हो गई। डॉक्टरों को उम्मीद है कि वह बिना किसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या के अपनी सामान्य ज़िंदगी में लौट आएगी। इस सफलता से पता चलता है कि शुरुआती पहचान, तुरंत इलाज और स्ट्रोक के लिए विशेषज्ञ देखभाल मिलना कितना ज़रूरी है।

इस दुर्लभ मामले के सफल इलाज से गंभीर स्ट्रोक के इलाज में 'मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी' जैसी एडवांस्ड प्रक्रियाओं के महत्व का पता चलता है। यह लोगों को यह भी याद दिलाता है कि स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है, यहाँ तक कि बच्चों और टीनएजर्स को भी स्ट्रोक हो सकता है। शुरुआती चेतावनी के संकेतों को पहचानकर और तुरंत एक्सपर्ट इलाज करवाकर, दिमाग को होने वाले स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है और रिकवरी में सुधार किया जा सकता है।

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